Saturday, August 18, 2012

राजा और बेताल

      (फोटो दैनिक भास्कर से साभार)

            राजा विक्रम ने फिर से उसी भ्रष्ट्राचार के पेड़ से घोटालें के शव को उठाया और अपने कंधे पर लाद  कर चलने लगा। दिन के उजालें में चारों तरफ अँधेरा छाया हुआ था, क्यूँ की पेड़ इतना विशाल और घना था की उसके अन्दर रौशनी की  किरण घुसने का प्रयास भी नहीं कर सकती थी। पेड़ की बड़ी बड़ी शाखाएं आसमान में घुसकर सूरज को डुबो दिया था। इस पेड़ की जड़ें इतनी मजबूत थी की पूरी पाताल  लोक तक पहुँच चुकी थी। 
पेड़ के जड़ोंने पुरे "जीवन" को सोख कर जमीं को नीरस बना दिया था। "जीवन" के बिना लोग  मर रहें थे।  दूर से मीडिया के भालू की पुकार और विपक्षी बादलों गड़गडहाट सुनाई दे रही थी। आम जुगनू की चमक और कडकडहाट के साथ आन्दोलन की बिजली बिच बिच में चमक रही थी।

                राजा विक्रम  शव को लेकर चल रहा था। शव के अंदर का बेताल  बोलने लगा। राजा मैं आज तुझे एक ऐसी कहानी सुनाऊंगा, कहानी के अंतमें कुछ सवाल पूछूंगा,अगर तू इसका उत्तर नहीं दे सका तो तेरे सर के सौ टुकड़े हो जायंगे। ऐसा कहकर कहानी सुनाने लगा।

               दुनिया में एक भारत नाम का देश हैं । उस देश में एक मोहन नाम के महामंत्री रहते थे , जो की ईमानदारी का कवच पहनकर  वो अपना कामकाज संभालते थे। गाँधी के विचार धारा पर चलने वालें, बुरा मत बोल, बुरा मत सुन और बुरा मत देख। इसी विचार धारा को  बड़ी ही कट्टरता से पालन करते  थे । इस देश में जो भी कुछ होता था, वह बुराही होता हैं, यह सोच कर,वो कुछ भी देख नहीं पाते। ठीक इसी तरह लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपनी यातनाएं कहते थे,महामंत्री जो थे की, गाँधी के बन्दरों के प्रति बहुत ही संवेदनशील थे, इस लियें वो किसी इंसान  की बातों को इतनी अहमियत देना उचित नहीं समझते थे। दिन रात  यही सोचकर काम किया करते थे।

             देश में पडोसी देश के लोग घुस कर आतंक फैलाते रहते थे, फिर भी उन्ही के मुह से शब्द बहार नहीं निकलता।  उनका ईमानदारी का कवच भी कोयले की आग में जलने लगा था। जिस जिस जगह पर कवच जल चुका था, वहाँ से बेईमानी  की झलक दिखाई पड़ रही थी। यह सब इस लियें हो रहा था की वह कुछ भी कहने से पहले अपनी बॉस के सलाह लिया करते थे। अब सवाल यह हैं की उनकी बॉस उन्हें जो कहने को कहती वही वो कहते, जो देखने को कहती वही वो देखते, और जो सुनने को कहती वही वो सुनते। बहुतसे मंत्रीगन जो उनके अधीन काम करते थे, वो कोई भी काम देशहित में नहीं करतें थे। सिर्फ और सिर्फ घोटालें कर के देश को लुट रहे थे। देश के लोगों के सामने एक बड़ा ही रहस्य खुलता हैं, लोग यह देख कर चिंतित होते हैं। वो घोटाला कुछ इस तरह था।  कोयला घोटाला 1, 86, 000 करोड़  रुपए का हैं, जो की अब तक का सबसे बड़ा घोटाला उभरकर सामने  आया था । इसके पहले जो 2 जी का घोटाला हुआ, घोटालें की राशी थी 1,76,000 करोड़ रूपए।

        बेताल थोड़ी देर रुका और राजा से कहा देख अब मैं महामंत्री मोहन की लाइव बातचीत सुनाता हूँ। यह कहकर वेताल ने विक्रम के कान में माइक्रोफोन रख दिया।

      अब विपक्ष ने हमले तेज़ कर दिए थे इस लिए महामंत्री अपनी बॉस को फोन करके पूछता हैं।

 "मैडम मैं क्या करूँ ? क्या मैं इस पद को छोड़ दूँ? मीडिया को क्या जवाब दूँ ? लोगों को कैसे मुह दिखाऊं?"

उधर फोन से मैडम कहती हैं। "देखो तुम्हें डरने की कोई जरुरत नही, तुम वही गाँधी के बंदरोवाले गुण का उपयोग करों?"

"कौनसे गाँधी मैडम" महामंत्री  ने पूछा।

"वही जो सबका बाप हैं जिसने कहा बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो" मैडम ने कहा।

"लकिन एक समस्या हैं" महामंत्री ने पूछा।

"अब क्या हैं ?" मैडम चिल्लाते हुए बोली।

"उधर तीन  बन्दर थे एक ने कान, दुसरेने आँख, और तीसरे ने मुह बंद किया था, मैं अकेला यह सब कैसे कर पाउँगा? अब मैं तिन गाँधी कहांसे ला पाउँगा "?महामंत्री ने कहा।

"पागल तीन  गाँधी नहीं, तीन बन्दर बोल, क्या गाँधी और बन्दर में कुछ भी अंतर नहीं हैं ? और सुनो जहाँ  जो बंद करना हैं वही करना सब एक साथ बंद करने की जरुरत नहीं" मैडम ने कहा।

"सॉरी मैडम बात यह हैं की हमेशा तीन  गाँधी नजर आतें हैं, इस लिए थोड़ी गलती हो गयी।" महामंत्री  ने कहा।

"ठीक हैं अब समझ में आई ना बात।" 

 "नहीं मैडम एक और बात हैं।

 "क्या हैं ?"

"गांधीजी ने बन्दरों का चुनाव क्यूँ किया होगा? इंसान को भी चुन सकते थे ना।"

"पता नहीं मैं फोन रखती हूँ "

"ठीक हैं मैडम" कहकर महामंत्री  ने फोन रख  दिया। 

      यह सब सुनाने के बाद बेताल ने राजा से कहा 'अब बता की इतना सब कुछ होने के बाद भी क्या इमानदार कहलाने वाले महामंत्री को इस पद पर रहना चाहियें या नहीं ? या मैडम के दिए हुए रास्ते पर चलना चाहियें ?        

      राजा विक्रम कहने लगा "मेरे हिसाब से उस महामंत्री को पद छोड़ने की कोई  आवशकता नहीं। क्यूँ की यह पब्लिक हैं, थोड़े दिनों बाद सब कुछ भूल जाती हैं। अब कॉमनवेल्थ और 2 जी घोटालें लोग भूलने लगे हैं। ठीक इसी तरह यह लोग कोयला घोटाला भी भूल जायेगे। मीडिया भी कितने दिन तक इसी खबर को भुनाएगा, और विपक्ष कितने दिनों तक विरोध का नाटक करेगा। कुछ दिन की तो बात हैं।"     

      वेताल कहने लगा "बात तो सही हैं, लेकिन जो राजा विकास और न्याय की बाते करता था, उस राजा से मुझे यह अपेक्षा नहीं थी। क्या राजा तू  भी इस मैडम के बातों से सहमत होकर इस देश के लोगों को धोका देने लगा हैं। बेताल यह वाणी सुनकर राजा जोर जोर से हँसने लगा।    

     और थोड़ी देर बाद राजा ने बेताल को समझाया की मैं वो राजा विक्रम नहीं हूँ, बल्कि मैं तो 2 जी वाला राजा हूँ।  यह सुनते ही शव उड़ने लगा और फिर उसी राजा को जोर से पकड कर राजा के साथ साथ उड़कर पेड़ पर जाकर लटक गया।


Tuesday, August 14, 2012

तो दे दो



दिल की  'फोनरिंग' सुनना हैं,
प्यार का 'मिस कॉल' तो दे दो

दिल  के गीत को गुनगुनाना हैं,
गीत गाने का माहौल तो दे दो 

दिल  से दिल के अंदर जाना हैं,
अब दिल के द्वार खोल तो दे दो 

मुझे तुमसे प्यार जताना हैं,
जज्बातों को मोल तो दे दो 

दिल से  दिल का सौदा करना हैं,
प्यार के तुला से तोल तो दे दो 

एक 'रन'से दिल को जितना हैं,
प्यार का एक 'नोबॉल' तो दे दो


प्यार के  'फेसबुक' पे लिखना हैं,
दिल की एक 'वॉल' तो दे दो

प्यार के खेल में नायक  बनना हैं,
जीवनपट में  एक 'रोल' तो दे दो

तेरे ही दिल में घर बसाना है,
दो बेड़रूम एक 'हॉल' तो दे दो

प्यार के 'कार' को  चलाना हैं,
राहदारी का 'टोल' तो दे दो

दिल पे तेराही नाम लिखना हैं,
दिल के टुकड़े का 'स्क्रोल' तो दे दो

दिल के शो केस में सजाना हैं,
तस्वीर की एक 'डॉल' तो दे दो

तुम्हे याद कर मेले में खोना हैं,
मेले का एक 'शोल' तो दे दो

मन में झांककर देखना हैं,
दिल के खिड़की में 'होल' तो दे दो

'फेसबुक' पे हालेंदिल  बयान हैं,
पसंदी नहीं सिर्फ 'लोंल' तो दे दो

अब टूटे हुए दिल को जोड़ना हैं,
आखिर में  'फेविकोल' तो दे दो

(other language words used -Phone ring, miss call,  run,no ball, hall, car, role,wall, Facebook, role, scroll, doll, shoal,hole,lol and  fevicol)

Wednesday, August 8, 2012

आज़ादी का एहसास




उत्सव मनातें हैं आज़ादी  का  एहसास लियें
जीते हैं सिर्फ करमुक्त एक एक साँस लियें

हम भी आज़ाद हैं यही दुनिया को बतातें हैं 
आजादी  की तड़प लियें, दिल को सतातें हैं 
महंगाई की गुलामी में जी रहें हैं लोग यहाँ,
भ्रष्टाचार मुक्त जीवन का  एक रास लियें
उत्सव मनातें हैं आज़ादी  का  एहसास लियें


कहते थे बुरे कामों का बुराही फल होता हैं 
लेकिन यहाँ तो बुरा नेताही सफल होता हैं 
आज़ादी किसे मिली पता ही नहीं होता, 
आम लोग जीते,जीने की जिंदा लाश लियें
उत्सव मनातें हैं आज़ादी का  एहसास लियें 

क्या इसी आजादी को हम लोकतंत्र कहतें हैं 
जहां नेता इसेही खाने का एक मंत्र कहते हैं
भ्रष्टाचार से आज़ादी की लड़ाई अभी बाकि  हैं
जीते हैं नयी आज़ादी की एक आस लियें
उत्सव मनातें हैं आज़ादी का  एहसास लियें

अब हमें अमर देशभक्तों के  नाम याद रहें
चल बसें वो देकर जान, वो काम याद रहें
आजाद, भगत सिंग,राजगुरु, सुखदेव सारें,
मर मिटे थे,  आज़ादी का एक  ताश लियें
उत्सव मनातें हैं आजादी का  एहसास लियें

अमर होकर छोड़ गएँ वो हम सबका साथ
देश की चाबी देकर इन भ्रष्ट नेतावों के "हाथ"
चलो, अब हमें भी  करना हैं एक नेक  काम,
अब नयें अहसास की, एक नयी तलाश लियें
उत्सव मनातें हैं आज़ादी का  एहसास लियें