Wednesday, November 14, 2012

"खोता हुआ बचपन"



एक तरफ जो होटेल में काम करने वाला रामू जब अपने मालिक से बात करता हैं।

"साब  कल छुट्टी चाहियें अपुनको" बाल मजदूर रामू ने अपने मालिक से पूछा।

"क्या करेगा छुट्टी लेकर, काम क्या तेरा बाप आकर करेगा? दिवाली में छुट्टी!" मालिक ने चिल्लायाँ।  

"साब मेरी माँ की तबियत ठीक नहीं हैं" रामू विनम्र होकर  कहा।

"दूंगा एक झापड़ चल वो टेबल साफ कर जा, मेरा मुह क्यूँ देखता हैं?  काम नहीं करेगा तो खाना नहीं मिलेगा और एक बात याद रख छुट्टी नहीं मिलेगी" होटल मालिक ने जवाब दिया। 

     हमारें  देश में कई बच्चे ऐसे हैं, जिसे शिक्षा तो दूर की बात हैं, लेकिन मुलभुत  सुविधाएं मिलना भी मुश्किल हैं। कई बच्चे ऐसे हैं जो की किसी होटल में या घरोंमें मजदूरी  करके अपना जीवन व्यतीत करतें हैं। अब हमें यह सोचने की जरुरत हैं, जिन  बच्चों को पेट भरने की चिंता सताती हैं, वो शिक्षा के बारें में सोच भी नहीं सकते, अब हमारी पहली प्राथमिकता यह होनी चाहियं रोटी कपडा और मकान के साथ शिक्षा, जब हम सीर्फ शिक्षा पर विचार करतें हैं तो यह गलत होगा की केवल भूके पेट और कपड़ों  के बिना केवल शिक्षा देना सही नहीं होगा। इनका बचपन तो पेट की आग में जल रहा हैं।


  दूसरी तरफ रीमा को अपनी सहेली के साथ बहार खेलने जाना था, इस लियें वो अपनी माँ से पूछती हैं।

"माँ मुझे सीमा के साथ खेलने जाना हैं" रीमा ने माँ से पूछा।

"रीमा तुमने होमवर्क पूरा किया ? चलो पहले छुटियों में दिया हुआ होमवर्क पूरा करों" माँ ने पूछा।

"माँ मैं आने के बाद होमवर्क करुँगी" रीमा ने कहा। 

"रीमा तुम्हें पता हैं? पड़ोस के वर्मा के  बेटेने स्कूल में अव्वल स्थान काबिज किया हैं, देखा हैं कभी उसे दुसरें बच्चों के साथ खेलतें? नहीं ना! चलो होमवर्क करों, कहीं खेलने जाने की जरुरत नहीं हैं" माँ ने कहा।

         दूसरी तरफ हम उन  बच्चों के बारें में सोचना होगा, जो की शिक्षा के भाग दौड़ में अपना बचपन खो  देते हैं। जिन्हें हम एक स्पर्धा में धकेल देते हैं, जो की कभी खत्म नहीं होती, स्कूल के बड़े बैग ओ कंधेपे अटकाकर हर रोज़ स्कूल जाते हैं, जो की जरुरत से ज्यादा मानसिक तनाव स्पर्धा।  अभिभावक के साथ साथ टीचर का दबाव, अब जो बच्चे शिक्षा ले रहें हैं, और जो नही ले रहें हैं, उनमे ज्यादा अंतर नहीं हैं। अब अगर हम यह कहते गए तो कई सवाल उठेंगे, की क्या हम इस शिक्षा को बंद कर देना चाहियें ? नहीं मेरा कहना यह नहीं हैं। लेकिन हमें कुछ ऐसा करना होगा की बच्चे के प्रतिभा के अनुसार शिक्षा देनी होंगी, क्या हम सब यह कर पायेंगे। दूसरी तरफ वह बच्चे जो की प्रतिस्पर्धा के आग में अपना बचपन खो रहें हैं, जो की हमने प्रतिस्पर्धा का एक वर्तुल बना दिया हैं और बच्चे इस वर्तुल में मंजिल के आस में चक्कर काट रहें हैं। क्या यहीं हैं सच्चा बचपन, क्या इसे बदलना जरुरी नहीं? क्या अब वक्त आ गया हैं की  इस  शिक्षा प्रणाली को बदलने की जरुरत हैं। जो की खोता हुआ बचपन वापस ला सकें।