Tuesday, January 1, 2019

समय चक्र -नया साल मुबारक़....



बीत गयी जिंदगी समयजाल में लटकते लटकते,
गएँ  वो पल तारीखोंके पन्नों को टटकते टटकते।।

बीत गए दिन महीने साल इस समय के सफर में,
सफर जिंदगी का गुजरा यूँही वक्त झटकते झटकते।

एक दिन हमारा होगा रह गएँ यह सोचते सोचते,
गुमशुदा की तरह समयचक्र में यूँ ही भटकते भटकते।

वहीँ सफर, वही मंजिल, सिर्फ अंक बदलते रहें,
पुराने समयको यूँ  ही निगल गयां चटकते चटकते।

समय कब आगे निकल गया पता ही नहीं चला,
नयी नयेली दुल्हन सा आया साल मटकते मटकते।

समय की यह चाल अपने द्वार एक दिन आएगी,
जैसे आया नया साल अपना द्वार खटकते खटकते।

समय  खेल हैं भी अजब हैं, घूमता और फिरता भी,
आया हैं नया साल पुराने साल को पटकते पटकते।

तारीखोंका खेल, हम देखते रहे मुसाफिर जैसे,
साल मुबारक़ कहकर, हम भी सटकते सटकते।

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